सिर पर दस्तार बांध कर पापड़ बेचने निकलती है ये सिखनी, जानिए पूरी कहानी

पंजाब के एक छोटे से गांव, मलकाना पट्टी, से आने वाली जमुना कौर युद्ध में खड़ी एक योद्धा से कम नहीं हैं। अपने परिवार को आर्थिक बदहाली से उबारने का जिम्मा उठाए जमुना गलियों में घूम घूम कर पापड़ बेच रही हैं। उनके साथ उनका छोटा भाई अमर भी कम मेहनत नहीं कर रहा है।

आर्थिक स्थिति बेहद ही नाज़ुक

परिवार की आर्थिक स्थिति कुछ इस कदर है कि घर की छत कभी भी जान पर आफत बन कर गिर पड़े। घर मे बैठने तक के लिए कोई सुरक्षित जगह नही है। जमुना के पिता एक गाड़ी चालक हैं, जिसका कर्जा वो अभी तक उतार रहे हैं। जमुना को अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी क्योंकि उनके पिता के लिए जमुना के पढ़ाई का खर्च उठा पाना मुमकिन नहीं है। इस बदहाल स्थिति में जमुना ने अपने पिता को अकेले ना छोड़ने का फैसला लिया और निकल पड़ी अपने भाई के साथ पापड़ बेचने। दोनों भाई बहन रोज सुबह गुरुजी के सामने माथा टेक कर निकलते हैं और शाम ढलने तक काम करते हैं। हालांकि इससे उनको कोई बहुत ज्यादा पैसे नहीं मिल पाते, बमुश्किल दो सौ से तीन सौ कमा पाते हैं, परन्तु उनके कोशिश में कोई कमी नही है।

दस्तार बांध कर निकलती हैं बाहर

जमुना एक ऐसे समाज में हैं जहां लड़कियों के लिए कोई भी काम करना इतना आसान नहीं है। उनको लड़की होने का उनके काम पर कोई प्रभाव ना हो इसलिए वो दस्तार बांध कर ही घर से निकलती हैं। इससे उनको ये डर नहीं रहता की कोई उनके साथ किसी तरह को बदतमीजी करेगा। हालांकि वो ये भी कहती हैं कि गुरुजी की कृपा से अभी तक उनके साथ ऐसा कोई वाकया नहीं हुआ है। जमुना ये भी मानती हैं कि वो अपनी मेहनत और ईमानदारी से पैसे कमाना चाहती हैं ना कि मांग कर गुजारा करना चाहती हैं।

नौजवानों की संस्था आई मदद को सामने

जमुना का यह जज्बा काबिले तारीफ़ है लेकिन यह कोशिश उनके परिवार को इस आर्थिक बदहाली से उबारने में नाकाफी है। इसी जज्बे को देखते हुए सिख नौजवानों की एक संस्था ने सरकार से इस परिवार तक मदद पहुंचाने की मांग की है। उन्होंने दानी सज्जनों से भी कुछ मदद के लिए अपील की है।
आज के समय में हम ऐसे बहुत से महिला योद्धाओं से मिलते हैं या उनके बारे में सुनते हैं। जमुना का यह जज्बा और प्रयास किसी दूसरे से कम नही है।

Leave a Reply

%d bloggers like this: