भारत के इंद्रधनुषी समाज के लिए समानता पाने की लंबी एवं कठिन राह #Pride Month: Love has no Gender

                 “इन दिनों, दिल मेरा, मुझसे है कह रहा 

                   तू ख्व़ाब सजा…तू जी ले ज़रा…

                  है तुझे भी इजाज़त..कर ले तू भी मुहब्बत”

इस गाने की यह खूबसूरत पंक्तियां प्यार करने की आज़ादी का आभास कराती हैं। कहते है प्यार न तो रंग देखता हैं न ही शारीरिक आकार,न ही  लिंग और धर्म। प्यार एक एहसास हैं जो किसी से भी हो सकता हैं परंतु समलैंगिक रिश्तों को कई सालों तक गलत तथा असामान्य माना गया हैं।

हम कहते तो हैं कि मानवाधिकार के विचार का केंद्र मूल्य इस आधार पर टिका हैं कि सभी मनुष्य समान हैं तथा सभी को अपना जीवन अपने अनुसार जीने की आज़ादी हैं परन्तु यह बात किस हद तक सच हैं यह विचार करने का विषय हैं। हमारा संविधान कहता तो हैं कि हम सब समान हैं तथा सभी मनुष्य अपने निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र हैं परंतु क्या इस बात को अमल में लाया जाता हैं?

चाहे सुप्रीम कोर्ट ने धारा 377 हटाकर इस बात की पुष्टि कर दी हैं की यह अपराध नही हैं तथा समलैंगिक होना सामान्य हैं परंतु इस भारतीय समाज के कई लोग अभी भी इसको सृष्टि के नियमों के विपरीत मानते हैं। भारत में इस इंद्रधनुषी समाज ने दशकों से कई परेशानियों का सामना किया हैं परन्तु अपने अधिकारों को पाने के लिए समलैंगिक समाज ने कभी हिम्मत नहीं हारी तथा अंत तक लड़ते रहें।

इंद्रधनुषी समाज से तात्पर्य :

LGBTQ इस इंद्रधनुषी समाज का हिस्सा हैं। LGBTQ लेस्बियन, गे, बाइसेक्सुअल, ट्रांसजेंडर और क्वीर या कुएसशनिंग के लिए प्रयोग किया जाता है। इन शब्दों का उपयोग किसी व्यक्ति की यौन अभिविन्यास का वर्णन करने के लिए किया जाता है।

लेस्बियन वह महिलाएँ होती हैं जिनका आकर्षण महिलाओं की तरफ होता हैं। इसी प्रकार गे विशेषण ऐसे लोगों का वर्णन करता था जिनका भावनात्मक आकर्षण समान लिंग के लोगों के प्रति हों।वहीं दूसरी ओर बाइसेक्सुअलस का आकर्षण का केंद्र समान लिंग या दूसरा लिंग भी हो सकता हैं। 

व्यक्ति का ट्रांसजेंडर होना जन्मजात होता हैं। इनकी लिंग पहचान या लिंग की अभिव्यक्ति आमतौर पर साधारण लिंग के रूप में नही करते। क्वीर के अंतर्गत मनुष्य अपनी पहचान निश्चित तौर पर एक नहीं बताते। कुएसशनिंग के अंतर्गत वो लोग शामिल हो सकते हैं जो अपनी लिंग पहचान को ले कर अभी भी निश्चित नहीं हैं।

परेशानियों का सामना :

भारत जैसे देश में इस समलैंगिकता को लोगों द्वारा स्वीकारा जाना बेहद कठिन रहा हैं। इस कम्युनिटी को कई परेशानियों का सामना करना पड़ा हैं। सामाजिक बहिष्कार, अपने ही घर से परिवार द्वारा बेघर करना, होमोफोबिया,नौकरी न मिलना, लोगो द्वारा मज़ाक उड़ाया जाना , गंदे शब्दों का प्रयोग ब्लैक मेल आदि। 

इन सभी कारणों की वजह से लोग खुल कर सामने आने में बेहद हिचकिचाते हैं। परिवारों द्वारा इस कम्युनिटी का हिस्सा होना परिवार के लिए कलंक तथा असामान्य माना जाता हैं। शहरों में सोशल मीडिया की पहुँच तथा शिक्षा का स्तर होने के कारण कुछ हद तक परिवार इस बात को स्वीकार कर रहे हैं परंतु ग्रामीण इलाकों में खुल कर सामने आने वाली समलैंगिक महिलाओं को मार पीट,रेप जैसी कई परेशानियों का सामना करना पड़ता हैं।

LGBTQ #Pride Week

“Being asked why you’re gay is like being asked why you were born human!”
― K.L. Laitinen

धारा 377 के हटने के बाद के बदलाव :

6 सितंबर 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने धारा 377 को हटा कर भारत के लाखों LGBTQ समुदाय के जीवन को बदल दिया। इस कदम ने लोगो को खुल कर सामने आने में मदद की हैं। भारत में कई समलैंगिक दंपति ने शादी कर इस ऐतिहासिक कदम का जश्न बनाया हैं।  परिवारों के अंदर स्वीकार्यता में भी धीरे धीरे बढ़ोतरी हो रहीं हैं। लोग अब बिना डरे सामने आ रहे हैं तथा अपने अस्तित्व को स्वीकार रहे हैं।

भारतीय सिनेमा भी इस काम को बखूबी कर रहा हैं। शुभ मंगल ज्यादा सावधान व कपूर एंड सन्स जैसी फिल्में इस समुदाय को प्रदर्शित कर लोगो को खुल कर सामने आने की प्रेरणा दे रहीं हैं। इस विषय को समझाने के लिए भारतीय शिक्षा प्रणाली को भी अपने पाठ्यक्रम में इन विषयों को शामिल करना चाहिए तथा अभिभावकों को भी सेक्स एजुकेशन जैसे मुद्दों पर खुल कर बात करनी चाहिए।

हम हर वर्ष जून में प्राइड माह बनाते हैं तथा समानता के भाव को प्रदर्शित करने का प्रयास करते हैं। इस कदम ने लोगों को अपनी सेक्सुअल आइडेंटिटी को जानने में मदद की हैं क्योंकि अब लोग बिना किसी भय खुल कर एक्स्प्लोर करने लगें हैं। समलैंगिकता कोई बीमारी नहीं हैं तथा सृष्टि के विपरीत नहीं हैं। अभी भी भारतीय समाज इस बात को मानने में संकोच करते हैं तथा अपने बच्चो को खुल कर सामने आने से रोकते हैं। इस भाव को मन से पूरी तरह खत्म करने की आवश्यकता हैं ।

LGBTQ #Pride Week

“Openness may not completely disarm prejudice, but it’s a good place to start.”–Jason Collins, first openly gay athlete in U.S. pro sports (Artwork By:- Shivesh Pandey, Graphic Designer, The Hindi Mail)

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