दुनिया के अंत वाला माया कैलेंडर आखिर बना कैसे?

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21 जुलाई कई खास कारणों से चर्चा का विषय बना हुआ है मगर इनमे सबसे अहम है दुनिया का अंत। जी हां आजकल इंटरनेट पर सब लोग इसी बात को लेकर चर्चा कर रहे हैैं क्योंंकि मशहूर माया कैलेंडर के अनुसार आज धरती का अंत होने वाला है। मगर दुनिया के अंत की भविष्यवाणी करने वाला ये कैलेंडर आखिर बना कैसे और क्यों लोग इसको इतना मानते हैं?

मायन या मायान अमेरिकन सभ्यता की देन है। माया सभ्यता के निशान 1800 ईसा पूर्व तक देखने को मिले हैं मगर करीब 250 से 900 ईसा पूर्व तक मायन सभ्यता मध्य और उत्तरी अमेरिका में विकसित हुई जिसे मायन सभ्यता का सुनहरा युग कहा जाता है। जहां किसी समय पर मायन सभ्यता के लोग रहते थे वहां आज मेक्सिको का यूकाटन नामक शहर बस्ता है।

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Photo Credit:- Google

इस सभ्यता के लोग गणित, कला, ज्योतिष, वास्तु अथवा लेखन में काफी माहिर थे। ग्वाटेमाला, मेक्सिको, यूकाटन तथा होंडुरस में इस सभ्यता के अवशेष खोजकर्ताओं द्वारा पाये गए हैं। कुछ पुरातत्व विज्ञानियों की माने तो ईसा से 1000 वर्ष पूर्व से ही मायन सभ्यता के लोगों ने इमारतें बनाना शुरू कर दिया था।

करीब 400 सालों यानी के 600 ईसा पूर्व तक मायन लोगों ने काफी परिसर बना लिए थे। शहर बसाने और भवन निर्माण का कार्य विशाल स्तर पर 250 से 900 सन के बीच हुआ। इसी काल को कलात्मक विकास का स्वर्ण युग भी कहा जाता है। इस दौरान नगर प्रधान राज्यों के निर्माण के साथ साथ कृषि का भी विकास हुआ।

मिराडोर का प्रीक्लासिक शहर प्रीकोलमबियन अमेरिका में बनाये गए महानतम शहरों में से एक है।मगर जब इसकी तुलना माया सभ्यता की राजधानी तिकाल से की गई तो ये बात सामने आई कि यह शहर तिकाल के सामने तो कुछ भी नहीं था। वह तो मायन राजधानी के सामने एक बौने के समान था। इसी बात से ये अंदाज लगाया जा सकता है कि मायन लोग कितने निपुण और उन्नत थे।

माया लोग बहुत ही धार्मिक थे और वह सूर्य, चाँद, बारिश और अन्न के देवता की पूजा करते थे। माया सभ्यता में शिखर पर राजा या कुहल अजव हुआ करते थे जो कि आम लोगों और भगवान के बीच की कड़ी माने जाते थे।

मायन गणित और खगोल में काफी निपुण थे। उन्होंने शून्य के इस्तेमाल से लेकर कैलेंडर बनाने तक का काम बहुत माहिर तरीके से किया। उन्होंने 365 दिनों पर आधारित गोल कैलेंडर और 5000 साल तक चलने वाले लम्बे कैलेंडर का निर्माण भी किया।

मायन लोगों द्वारा बनाई गई इमारतो में पिरामिड भी शामिल हैं जो कि वह धार्मिक स्थलों पर बनाते थे। सन 900 के बाद इस सभ्यता के लोग इस इलाके से धीरे धीरे खत्म हो गए। वह क्यों और कहाँ गए इस बात पर बहुत सारी अटकलें लगाई जाती हैं मगर किसी के पास भी अपनी बात साबित करने का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है।

ये माना जाता है कि 9वी सदी के दौरान कुछ ऐसा हुआ जिसने माया सभ्यता को उसकी जड़ों तक हिला डाला। एक एक करके इसके इतिहासिक शहर खाली होने लगे और मायन सभ्यता का पतन शुरू हो गया।

कुछ इतिहासकार मानते हैं कि ऐसा इसलिए हुआ कि मायन लोगों ने अपने प्राकृतिक संसाधन इस हद तकखत्म कर दिए होंगे की वहां इतनी बड़ी संख्या में लोग न रह पाएं। कुछ लोग जंग को इसका कारण मानते हैं जिससे मायन सभ्यता में कई बदलाव आए और धार्मिक गुरुओं का समाज में दर्ज़ा कम होने से कई परम्पराएं और रीति रिवाज खत्म हो गए। आखिर में ये अंदेशा भी लगाया जाता है कि किसी कुदरती आपदा की वजह से इस समाज का पतन हुआ।

ये तीनों कारणों, ‘जनसंख्या में ज्यादा व्रद्धि और संसाधनों का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल, जंग और कुदरती आपदा’ ने मिलकर इस महान सभ्यता के खत्म होने में अपना योगदान दिया है।

》》प्रतीक तिवारी के सौजन्य से

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