जनहित याचिका: क्रांतिकारी परिवर्तनों का महत्वपूर्ण हथियार

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अधिकार मानवीय जीवन के महत्वपूर्ण आधार हैं। भारत जैसे घनी आबादी वाले देश में सबको संवैधानिक अधिकारों के रूप में सुचारु जीवन प्रदान करने का कार्य हमारी संविधान सभा ने बखूबी किया हैं। परन्तु सभी को इंसाफ मिले तथा उनके अधिकारों का उल्लंघन न हो ऐसा ज़रूरी नहीं हैं। इस कमी को पूरा करने के लिए भारत में न्यायिक सक्रियता का मुख्य साधन जनहित याचिका या सामाजिक व्यवहार याचिका (Social Action Litigation) रही हैं।

अब यह प्रश्न उठता हैं कि असल मायने में ‘जनहित याचिका” हैं क्या तथा कब और कैसे इसकी शुरुआत हुई? इस लेख के माध्यम से हम इन सभी प्रश्नों को खोजने का प्रयास करेंगे।

“जनहित याचिका” का अर्थ

जनहित याचिकाओं में जनता के हित से जुड़े मुकदमें शामिल होते हैं। अगर हम सामान्य कानूनी प्रक्रिया की बात करे तो व्यक्ति अपने अधिकारों के उल्लंघन होने पर  अदालत का दरवाजा खटखटा सकता हैं। 1979 में इस अवधारणा में बदलाव आया तथा न्यायालय ने उन मुकदमों को शामिल किया जिन्हें पीड़ितों के लिए उनकी और से किसी दूसरें व्यक्ति ने दाखिल किया हो। इसके अंदर सामाजिक कल्याण के कई मुद्दे शामिल हैं जैसे बँधुआ मजदूरी, बालश्रम, गरीबों के जीवन को बेहतर बनाने की माँग, पर्यावरण की सुरक्षा,शिक्षा,शहरी विकास,महिला सशक्तिकरण आदि। जनसेवा का भाव रखने वाले नागरिक तथा स्वयंसेवक संगठन इस काम के लिए बढ़-चढ़ कर सामने आए तथा कई मुद्दों पर न्याय दिलाने का कार्य बखूबी किया।

शुरुआत में न्यायालय ने अखबारों में छपी खबरों और डाक से प्राप्त शिकायतों को आधार बना कर उन पर विचार करना शुरू किया तथा धीरे धीरे यह सिलसिला आगे बढ़ता गया। इस तरह न्यायपालिका की यह नई भूमिका न्यायिक सक्रियता के रूप में लोकप्रिय हो गई तथा जनहित याचिका न्यायिक सक्रियता का सबसे प्रभावी साधन बन गई।

इतिहास

इस प्रकार की याचिकाओं की शुरुआत अमेरिका में हुई। अमेरिका में इसे ‘सामाजिक कार्यवाही याचिका’ के नाम से जाना जाता है। भारत में जनहित याचिका की शुरुआत पी.एन.भगवती ने की थी।

पी. एन. भगवती

पी. एन. भगवती

इन याचिकाओं का महत्वपूर्ण उद्देश्य केवल जनता के हितों की रक्षा एवं सुरक्षा था। इनका लक्ष्य जल्दी तथा सस्ता न्याय दिलवाना हैं। इन याचिकाओं द्वारा समूह हिट से जुड़े मुद्दों को देख जाता हैं न कि व्यक्ति हित। इन्हें स्वीकारना या अस्वीकारना पूर्ण रूप से न्यायालय पर निर्भर करता हैं तथा अगर कोई इसका दुरुपयोग करें तो याचिकाकर्ता पर जुर्माना भी  लगाया जा सकता हैं।

जनहित याचिकाओं की स्वीकार करने हेतु उच्चतम न्यायालय ने कुछ नियम बनाये हैं जैसे केवल जनहित से प्रेरित व्यक्ति एवं संगठन ही इन याचिकाओं को न्यायलय में ला सकते हैं। साथ ही एक नियम यह हैं कि कोर्ट को अधिकार होगा अगर किसी याचिका के सामान्य न्यायालय शुल्क को माफ करना चाहता हैं। यह याचिका राज्य के साथ ही निजी संस्थानों के विरूद्ध भी लायी जा सकती हैं।

अधिकारों के दायरे में बढ़ोतरी

जनहित याचिकाओं के माध्यम से न्यायालय ने  अधिकारों का दायरा बढ़ दिया हैं। उन मुद्दों को जो पूरे समाज के अधिकार हैं उन्हें शामिल किया गया हैं। शुद्ध हवा-पानी और अच्छा जीवन इन सभी मुद्दों को जनहित याचिकाओं के माध्यम से स्वयंसेवक संगठनों ने आगे रखा।

नकारात्मक पहलू

इससे न्यायलयों में काम का बोझ बढ़ा हैं। इसी के साथ न्यायिक सक्रियता से विधायिका,कार्यपालिका और न्यायपालिका के कार्यों के बीच अंतर कम हो गया हैं। न्यायालय उन समस्याओं में उलझ गया हैं जिसे कार्यपालिका को हल करना चाहिए। उदाहरण के लिए, वायु और ध्वनि प्रदूषण दूर करना,भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की जांच करना या चुनाव सुधार करना वास्तव में न्यायपालिका का कार्य नहीं हैं परन्तु जनहित याचिकाओं की वजह से न्यायालय को इन कामों को करना पड़ता हैं। यह सभी कार्य विधायिका के अंतर्गत आते हैं। इसी वजह से कुछ लोगों का मानना हैं कि न्यायिक सक्रियता से सरकार के 3 अंगों विधायिका,कार्यपालिका एवं न्यायपालिका के बीच सन्तुलन बनाए रखना कठिन हो गया हैं । लोकतांत्रिक सिद्धान्त के अनुसार सरकार के हर अंग को एक दूसरे के शक्तियों एवं क्षेत्राधिकार का सम्मान करना चाहिए। न्यायिक सक्रियता से इस लोकतांत्रिक सक्रियता से गंभीर रूप से गहरी चोट पहुँची हैं तथा आगे पहुँच सकती हैं।

अतः यह कहना गलत नहीं होगा कि न्यायिक सक्रियता ने हमारी राजनीतिक व्यवस्था को और मजबूत बनाने का कार्य किया हैं।  इससे न्याय व्यवस्था को लोकतांत्रिक बनाने में बेहद मदद मिली हैं तथा अनपढ़, गरीबों और जरूरतमंदों को न्याय दिलाना आसान एवं सस्ता हो गया हैं।

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