निजी नियोक्ताओं के विरूद्ध कोई बलपूर्वक कार्रवाई नहीं करने का सुप्रीम कोर्ट ने दिया आदेश

निजी नियोक्ताओं को राहत प्रदान करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक फैसला सुनाया। इसमें उन्होंने ये कहा कि निजी नियोक्ताओं के विरूद्ध इस लॉकडाउन काल में अपने कर्मियों के वेतन आपूर्ति ना करने पर कोई बलपूर्वक कार्रवाई जुलाई के अंत तक नहीं की जाएगी।

राज्य सुनिश्चित करें नियोक्ता और कर्मचारियों के बीच बातचीत: सुप्रीम कोर्ट

उच्च न्यायालय ने कहा कि राज्य नियोक्ता और कर्मचारियों के बीच वेतन आपूर्ति को लेकर वार्ता सुनिश्चित करें और संबंधित श्रम आयुक्त के साथ अपनी रिपोर्ट दर्ज करें।

केंद्र को 29 मार्च की अधिसूचना की वैधता पर जवाब दाखिल करने के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा चार और सप्ताह दिए गए हैं जिसने लॉकडाउन के दौरान पूर्ण मजदूरी के अनिवार्य भुगतान का आदेश दिया था।
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने मार्च में अपने परिपत्र में उन सभी नियोक्ताओं को जिनके प्रतिष्ठानों को COVID-19 के संक्रमण को रोकने के लिए बंद किया गया था, इस काल के लिए अपने कर्मियों को बिना किसी कटौती के वेतन आपूर्ति को कहा था।

जस्टिस अशोक भूषण, संजय किशन कौल, और एमआर शाह की बेंच ने आदेश जारी करते हुए कहा, “इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि उद्योग और मजदूरों को एक दूसरे की जरूरत होती है। पचास दिनों के वेतन आपूर्ति को लेकर विवाद को सुलझाने का प्रयास किया जाना चाहिए।”

जुलाई के अंतिम सप्ताह के लिए दायर की गई बाकी याचिकाएं

शीर्ष अदालत ने ये भी कहा कि जो लोग काम करने के इच्छुक हैं उन्हें मजदूरी को लेकर विवाद होने के बावजूद भी काम करने की इजाजत होनी चाहिए।

शीर्ष अदालत की खंडपीठ ने छोटे पैमाने पर औद्योगिक निर्माता संघ और लुधियाना हैंड टूल्स एसोसिएशन, फ़िकस पैक्स जैसे और अन्य कंपनियों द्वारा दायर 29 मार्च के परिपत्र के खिलाफ 18 याचिकाओं को जुलाई के अंतिम सप्ताह में सुनवाई के लिए दायर किया।
याचिकाकर्ताओं ने सरकार पर “नियोक्ताओं के लिए वित्तीय निहितार्थ पर उचित देखभाल और विचार-विमर्श किए बिना” आदेश पारित करने का आरोप लगाया था।

इसपर केंद्र ने अपना तर्क देते हुए कहा कि गृह मंत्रालय की अधिसूचना करोड़ों श्रमिकों की वित्तीय कठिनाइयों को दूर करने के लिए था। हालांकि अब उसको वापस ले लिया गया है और अब नियोक्ताओं को बस 54 दिनों का ही वेतन देना होगा।

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