पुणे के अस्पताल का दावा, प्लाज़मा थैरेपी का प्रयोग रहा सफ़ल

कंवलेसईंट प्लाज़मा थैरेपी एक प्रयोगिग विधि है जिसके अंतर्गत कोरोना वायरस से ठीक हो चुके मरीज़ के खून को कोरोना से पीड़ित मरीज़ को चढ़ाया जाता है।

एक वरिष्ठ डॉक्टर ने गुरुवार को ये दावा किया कि प्लाज़मा थैरेपी का पहला प्रयोगिक उपयोग सफल रहा। कोरोना के इलाज के रूप में ये प्रयोग पुणे के सरकारी अस्पताल साससून जनरल हॉस्पिटल में सफलता से किया गया। एक 47 साल की महिला जो कि हाइपरटेंशन, हैपेरथयरोइड और ओबेसिटी जैसे रोगों से भी ग्रस्त थी उसपर प्लाज्मा थैरेपी का प्रयोग किया गया। उनको 10 मई और 11 मई को 2 बार प्लाज़मा थैरेपी दी गयी।

साससून अस्पताल के डीन डॉ मुरलीधर तांबे ने बताया” मरीज़ की हालत में काफी सुधार आया और 14 दिनों बाद किये गए टेस्ट में वह कोरोना नेगेटिव पायी गयीं। उनको अब कोविड वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया है और उन्हें जल्द ही अस्पताल से छुट्टी मिल जाएगी।”

प्लाज़मा थैरेपी एक प्रयोगिक विधि है। इसमे जो मरीज़ कोरोना से ग्रस्त थे और अब ठीक हो चुके हैं, उनका खून उन लोगों को चढ़ाया जाता है जो कि कोरोना की वजह से बीमार हैं। जब कोई मरीज़ कोरोना से रिकवर हो जाता है तो उसका खून वायरस से लड़ने के लिए एंटीबॉडीज बनाता है। इस खून को जब किसी कोरोना के मरीज़ को चढ़ाया जाता है तो ये उम्मीद की जाती है कि ये एंटीबॉडीज मरीज़ की कोरोना से लड़ने में मदद करेंगी।

खून दान करने में और प्लाज़मा डोनेट करने में थोड़ा फर्क होता है। हालांकि इसके लिए भी दान करने वाले को कुछ खास शर्तों को पूरा करना पड़ता है जैसे कि वह 18-60 साल के बीच की उम्र का होना चाहिए, उसका भार भी अनुकूल होना चाहिए, उसका बीपी और हीमोग्लोबिन भी सही होना चाहिए आदि।

खून दान करते वक्त व्यक्ति के शरीर से खून निकाल कर एक बैग में रख लिया जाता है मगर प्लाज़मा डोनेशन की प्रक्रिया थोड़ी ज्यादा पेचीदा है। इसमें दान करने वाले का खून बाजू से निकलकर एक मशीन में दाखिल होता है जिसमे प्लाज़मा को बाकी खून से अलग कर लिया जाता है। बाद में डोनर के खून के बचे हुए आरबीसी और प्लेटलेट्स आदि को सेलाइन के साथ वापस उसके शरीर में भेज दिया जाता है। ये परिक्रिया खूनदान से ज्यादा समय लेती है।

प्लाज़मा को एकत्रित करने के बाद उसको 8 घण्टों के अंदर अंदर मरीज को चढ़ाना पड़ता है यां फिर उससे तुरंत फ्रीज़र में स्टोर कर लिया जाता है। वैसे डॉक्टर्स इसको फ्रीज करने की सलाह नहीं देते हैं क्योंकि ऐसा करने से एंटीबॉडीज की लड़ने की क्षमता कम हो जाती है।



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